वाल्मीकि रामायण

रामायण के अध्ययन से हमें भगवान श्री रामचन्द्र जी सहित कई अन्य पात्रों के उज्ज्वल चरित्र का चित्रण मिलता है , जिससे हमें प्रेरणाएँ मिलती है। सौतेले भाई के प्रति भातृ प्रेम का जो दर्शन इस ग्रंथ में प्राप्त है वह शायद ही संसार की अन्य किसी पुस्तक में उपलब्ध हो ! पिता के प्रति पुत्र का कर्तव्य व भव्यता के साथ उसका पालन करना, यह भी इस ग्रन्थ का एक अनुपम विषय है। मर्यादा पुरषोत्तम श्री रामचन्द्र जी का विश्वामित्र ऋषि के यज्ञ की रक्षा के लिए जाना, श्री रामचन्द्र जी का अतुल बलशाली एवं कुशल शस्त्रधारी होने के कारण ही शिवधनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा माता सीता के साथ स्वयंवर विवाह का होना, एक कुटिला नारी के कारण पूरे राजवंश का दुख सागर में डूब जाना, एक माता का अपने पुत्र के प्रति अनुचित मोह का होना, श्री रामचन्द्र का अपने भाई भरत को पूरी खुशी के साथ राज्य दे देना और भरत को राज्य के लिए योग्य बताना, भरत का अपने भाई के बिना राज्य को निरर्थक मानना और राजा बनने से अस्वीकार करना, भरत का अपने भाई श्री रामचन्द्र जी के पास जाना और राज्य स्वीकार करने के लिए आग्रह करना, श्री रामचन्द्र जी द्वारा अयोध्या वापस ना लौटने पर भी भरत स्वयं को राज्य के सेवक मान राज्य के कार्यभार को संभालना, वनवास के समय भगवान श्री रामचन्द्र का यहाँ से वहाँ ऋषियों के पास जाकर यज्ञ की रक्षा हेतु राक्षसों का संहार करते हुए जीवन यापन करना, माता सीता का रावण द्वारा अपहरण किया जाना, अतुल बलशाली पराक्रमी और सोने की लंका के नरेश होने पर भी पतिव्रता माता सीता द्वारा रावण को दुत्कारना और बिना भय के शत्रु के महल में भी अपने पति श्री रामचन्द्र जी की प्रशंसा करना, श्री रामचन्द्र जी का वीर बलशाली वेदज्ञ हनुमान जी के साथ मिलना, माता सीता की खोज करना और अंत में राक्षसों के राजा रावण का वध करना, श्री रामचंद्र जी का माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस आना आदि रामायण के मुख्य विषय हैं। जिसमें मर्यादा पुरषोत्तम श्री रामचन्द्र जी के यज्ञमय जीवन का अवलोकन कर सकते हैं।

साथ ही आजकल के प्रचलित रामायण में अनेक प्रक्षिप्त कथाएँ हैं, भ्रांतियां हैं, जिससे रामायण का महात्म्य घट जाता है। ऐसी कथाएँ जोड़ दी गई हैं जो बुद्धि के विपरीत सिद्ध होती है। जिसे अंधविश्वासी के सिवाय और कोई भी सत्य नहीं मान सकता। जो तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती । इन्हीं कथाओं के कारण "रामायण" रूपी एक ऐतिहासिक महाकाव्य मात्र काल्पनिक कथा बन कर रह जाती है।अस्तु।
जैसे कि ऊपर बताया जा चुका है कि रामायण में बहुत ही प्रक्षिप्त भाग है। जैसे वेदज्ञ वीर हनुमान को बन्दर मानना, मनुष्य पत्नियों की बाली, सुग्रीव आदि बंदर पतियों का होना, जटायु को पक्षी मानना, हनुमान का लंका दहन करना, अहिल्या तारण, माता सीता की अग्नि परीक्षा, रावण का दश सिर होना, राम द्वारा माता सीता को त्यागना, लवकुश का होना, माता सीता का धरती में समा जाना व पूरा उत्तर काण्ड की कथा आदि मुख्य प्रक्षिप्त भाग हैं। वाल्मीकि रामायण राम और सीता के अयोध्या आगमन के पश्चात राम के राज्याभिषेक तक सम्पूर्ण हो जाती है।
प्रस्तुत ग्रन्थ का उद्देश्य वाल्मीकि जी रचित रामायण को उसी रूप में दर्शाना है। रामायण एक महामानव की, मर्यादा पुरूषोत्तम श्री रामचन्द्र जी की जीवनी है, जो सच में हुए थे। रामायण कपोलकल्पितों की काल्पनिक कथा नहीं है। इस बात को डंके की चोट पर कहना है । विश्व की ऐतिहासिक पुस्तकों में रामायण का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए। इस ग्रन्थ में विद्वान संशोधन कर्ता ने प्रक्षिप्त भाग क्यों प्रक्षिप्त है, इसका तर्क सहित विश्लेषण किया है। जो किसी भी बुद्धिजीवी को स्वीकार्य होगा।
रामायण के विषय में उचित जानकारी हेतु यह उत्तम पुस्तक है। पुस्तक पढ़ने के पश्चात रामायण सम्बन्धी सारी शंकाओं का समाधान हो जाएगा, ऐसी आशा है। बाकी पाठकगण स्वयं ही अनुभव कर लाभ उठा सकते हैं।  
घर बैठे रामायण 
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