Yogeshvar Shri Krishna

सभी जीवात्माएं प्रवाह से अनादि काल से जन्म लेती आ रही हैं, ऐसे में मनुष्य का जन्म होना कोई विशेष बात प्रतीत नहीं होती किन्तु विशिष्ट संस्कारों से युक्त जब कोई पवित्र जीवात्मा शरीर धारण करती है तो निश्चित रूप से स्वयं को और समस्त मानवजाति को धन्य धन्य कर देती है एवं सदियों-सदियों तक उनसे प्रेरणा,ऊर्जा,उत्साह,ज्ञान प्राप्त करके मानव अपने को बुराइयों एवं अज्ञान से बचाकर कर्तव्य पथ पर अग्रसर होता है।
ऐसी ही एक पवित्र जीवात्मा का जन्म 5000 वर्ष पूर्व यदुवंश में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की रात्रि में रोहिणी नक्षत्र में आर्यावर्त की भूमि पर हुआ जो कि श्री कृष्णचन्द्र जी के नाम से सुप्रसिद्ध हुए। कहावत है- “होनहार बिरवान के होत चिकने पात” के अनुसार कृष्ण छोटी आयु से ही वीर, साहसी एवं नेतृत्व इत्यादि गुणों से युक्त थे। बचपन में पूतना वध, गाँव वालों को समय-समय पर होने वाली समस्याओं से बचाना आदि इन सब कारणों से श्री कृष्ण अपने क्षेत्र में सबसे प्रिय बन गए ।
महर्षि सांदीपनि के आश्रम से अपनी शिक्षा पूर्ण कर पुनः अपने गाँव मथुरा लौटे, उस समय में कृष्ण ने कंस के बढ़ रहे अत्याचारों को समाप्त करने का संकल्प लिया, अवसर पाकर कृष्ण ने चाणूर से दो-दो हाथ करके उसे परास्त कर दिया पश्चात् कंस को भी मार गिराया इस प्रकार कंस के अत्याचारों से जनता को मुक्त कर उनका दु:ख निवारण किया। कंस के मरने पर अत्यन्त क्रोधित हो मगध के राजा जरासंध ने कृष्ण पर कई बार आक्रमण किए किन्तु कृष्ण की बुद्धि और नीति से यादवों ने उन्हें मार भगाया। एक बार जरासंध ने कालयवन नामक राजा को कृष्ण से युद्ध करने भेजा। कालयवन की बड़ी भारी सेना को देख कृष्ण ने बड़ी ही चतुराई से मुचुकुन्द नामक राजा से कालयवन को मरवा दिया तथा दोनों पक्षों की सेना की रक्षा का सोच बड़ी ही कूटनीति से जरासंध का भीम से मल्लयुद्ध करवा उसे भी यमलोक भिजवा दिया। इसप्रकार कृष्ण ने कई अत्याचारी राजाओं को हराया।
समस्त मानव जाति को सुख देने की इच्छा से प्रेरित हो चक्रवर्ती सम्राट बनने की कामना से धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ रचाया, इस यज्ञ में कृष्ण ने स्वेच्छा से ब्राह्मणों के पैर धोने का पुनीत कार्य किया। ब्राह्मणों के प्रति कितने सम्मान का भाव कृष्ण के हृदय में रहा होगा, अनुमान किया जा सकता है। राजसूय यज्ञ में जब अर्ध्य देने की बात आई तब भीष्म पितामह ने श्रीकृष्ण का नाम लिया और अपने मत की पुष्टि में श्रीकृष्ण की जो प्रशंसा की, वह ऐतिहासिक है ,लाभार्थ प्रस्तुत है-
वेदवेदांगविज्ञानं बलं चाप्यधिकं तथा। 
नृणां लोके हि कोऽन्योऽस्ति विशिष्टः केशवादृते।।

दानं दाक्ष्यं श्रुतं शौर्यं ह्रीः कीर्तिर्बुद्धिरुत्तमा । 
सन्नतिः श्रीधृतिस्तुष्टिः पुष्टिश्च नियताच्युते।।
– सभा पर्व ११,१२
भीष्म पितामह महाराज युधिष्ठिर से कहते हैं इस मनुष्य लोक में वेद वेदांगों के गंभीर ज्ञाता, विभिन्न प्रकार के ज्ञान विज्ञान को धारण करने वाले, शारीरिक मानसिक तथा आत्म बल से पूर्ण केशव के बिना और कोई भी ऐसा नहीं है । दान देने में उदारता, कर्मों की कुशलता, विविध शास्त्रों का ज्ञान, शूरता, लज्जा, यश, अत्यन्त उन्नत बुद्धि, विनय, धैर्य, सन्तोष एवं पुष्टि ये सब के सब गुण केशव में विद्यमान हैं ।
कृष्ण को अर्ध्य दिया जाना शिशुपाल को स्वीकार ना हुआ, उसने विरोध किया, कई राजाओं को अपनी ओर मिलाया तथा कृष्ण को बहुत अपशब्द कहे, कृष्ण इसे सहन ही करते रहे लेकिन जब उसने युद्ध के लिए ललकारा तो कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट राजसूय यज्ञ निर्विघ्न संपन्न करवाया। उत्तम क्षत्रिय वंश के होते हुए भी महाभारत के युद्ध में कृष्ण ने अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार कर लिया। तो दूसरी ओर शिथिल पड़ते हुए अर्जुन को वेदविद् ब्राह्मण की तरह तत्वज्ञ कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया। कृष्ण के बार बार समझाने पर भी जब अर्जुन भीष्म से शिथिल हो कर युद्ध कर रहे थे तब मन्यु से युक्त हो श्री कृष्ण रथ का पहिया हाथ में ले भीष्म को मारने दौड़े तब योगेश्वर को आता देख भीष्म हाथ जोड़ कृष्ण को बोले- हे केशव! आपके हाथों मरना निश्चित ही पुण्य कारक होगा। श्री कृष्ण का सिद्धांत था कि अन्यायकारी चाहे कितना ही बलवान क्यों ना हो, मित्र बंधु अपना भी क्यों ना हो, उसको दंड अवश्य ही मिलना चाहिए तथा उसका वध तक किया जा सकता है, इस विचार ने तत्कालीन राजनीति में बड़ा ही क्रांतिकारी परिवर्तन किया। उत्तम कूटनीति, विशिष्ट चातुर्य, कुशल सारथीपन, वाक्पटुता, दूरदर्शिता से पग पग पर पांडवों की रक्षा किस प्रकार की है, इसके उदाहरण से महाभारत भरा पड़ा है। पाण्डव महाभारत युद्ध में विजयी हुए। महाराजाधिराज धर्मराज युधिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट के पद पर आसीन हुए। धर्मराज युधिष्ठिर को राज्य का शासन सौंप निश्चिंत हो, सांसारिक कर्तव्यों से निवृत होकर श्रीकृष्ण वन की ओर चलते हैं। पूर्व की अपेक्षा अधिक ईश्वर के चिंतन-मनन- निदिध्यासन-साक्षात्कार को लक्ष्य बना वानप्रस्थी हो साधना में लग गये। एक दिन किसी बहेलिये ने कृष्ण को मृग समझ बाण छोड़ दिया, कृष्ण ने उसे अभय दान दे प्राण छोड़ दिए। इस प्रकार तत्कालीन युग के महान् क्रांतिकारी, वीर, पराक्रमी, योद्धा, नितिनिपुण, वाक्पटु, विद्वान्, संयमी, तपस्वी एवं ईश्वरभक्त योगेश्वर श्रीकृष्ण का देह पंचतत्व में विलीन हो गया।

योगेश्वर श्रीकृष्ण पर लगाए जा रहे कुछ गम्भीर मिथ्या आरोपों का युक्तियुक्त एवं प्रमाणपूर्वक समाधान :-
आक्षेप १:- कृष्ण ने द्रोण,कर्ण एवं दुर्योधन इत्यादि को छल से मरवाया।
समीक्षा :- प्रथम तो हमें यह समझना चाहिए कि श्री कृष्ण ब्राह्मण वर्ण के ना होकर क्षत्रिय वर्ण के हैं और दूसरी बात यह है कि चाहे आचार्य द्रोण ही क्यों न हों किंतु थे तो अधर्म के ही पक्ष में और वैसे भी द्रोण ने भी युद्ध में कोई कम नियमों को नहीं तोड़ा था, ऐसे में प्रतिपक्षी जो अधर्म के पक्ष में होता हुआ अधर्मपूर्वक ही लड़ रहा है,को कूटनीति से परास्त करना अत्यन्त ही उचित है, यही यथायोग्य व्यवहार है और धर्म है और इस विषय में तो श्री कृष्ण जी सिद्धहस्त थे, जो ऐसे में सीधेपन से धर्म ही हार जावे तो उस सीधेपन का परित्याग करना ही श्रेष्ठ है क्योंकि वहाँ अन्यायकारी शत्रु को हरा विजयी होना ही धर्म है।

आक्षेप २:- श्री कृष्ण पर गोपियों के कपड़े चुराने 
भा.10/22/16-23 , रास करने भा.10/29/3-46 एवं महारास रचाने, कुब्जा समागम भा.10/42/4-12 इत्यादि महा घृणित आरोप घडते हैं।
समीक्षा:- जिस व्यक्ति ने जीवन में मात्र एक विवाह वह भी स्वयंवर की रीति से पूर्ण वैदिक विधि-विधानों से किया और विवाह के पश्चात् अपने सदृश पुत्र की उत्पत्ति की चाह में कृष्ण और रुक्मणी ने 12 वर्ष हिमालय पर तपस्या पूर्वक ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत किया एवं कृष्ण के सदृश रूप एवं बल से युक्त प्रधुम्न नामक पुत्र उत्पन्न किया। उस महान् संयमी योगेश्वर कृष्ण पर व्यभिचार का आरोप लगाते हो और यह भी कहते हो कि कृष्ण ने गोपियों के साथ खूब समागम किया और काम के बाणों ने उन्हें छुआ भी नहीं। वाह! वाह!! वाह!!! क्या ही विज्ञान से युक्त बात कही है, इन्हीं सब अश्लील बातों से ये पुस्तकें भरी पड़ी हैं। तथाकथित लोग अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए कृष्ण के चरित्र को ढाल बनाकर अपने प्रयोजन पूर्ण कर रहे हैं। श्री कृष्ण को अवतारवाद का चमकीला आवरण पहनाकर निष्कलंक चरित्र पर कैसे-कैसे लांछन लगा दिए हैं।
वेद कहता है- अकायम् अव्रणम् अस्नाविरम् -यजु ४०.८ वह ब्रह्म शरीर से रहित, छिद्र से रहित एवं नस नाड़ियों से रहित हैं, ऐसे में श्री कृष्ण ईश्वर कैसे हो गए?

युग-प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में लिखा-

देखो! श्री कृष्ण का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उनका गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्तपुरुषों के सदृश है। जिसमें कोई अधर्म का आचरण भी कृष्ण जी ने जन्म से मरणपर्यन्त बुरा काम कभी किया हो, ऐसा नहीं लिखा।

अतः हमें चाहिए कि हम महापुरुषों के शुद्ध जीवन चरित्र को पढ़ें तथा आधुनिक संचार के माध्यमों से अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाएँ। जिससे अधिक से अधिक लोग श्री कृष्ण के महान् चरित्र से अवगत हो लाभान्वित हो सकें।

महाभारत, योगेश्वर कृष्ण(पं. चमूपति जी), श्री कृष्ण चरित (डॉ भवानीलाल भारतीय),भागवत पुराण इत्यादि को देखा, इन्हीं ग्रंथों के प्रमाणों के आलोक में यह अतिसंक्षेप में लेख लिखा है कि जिससे सब मनुष्य श्री कृष्ण के सत्यस्वरूप से परिचित हो सम्पूर्ण जीवन चरित्र पढ़ने को उत्साहित हों। ऑनलाइन शुद्ध जीवन चरित्र मंगवाने हेतु निम्न लिंक पर देखें

http://www.savedesi.com/sri-krishna-charit.html

ऐतिहासिक तथ्यों में यदि कोई अज्ञानवशात् भूल हुई हो तो अवगत कराने पर प्रमाणित होने पश्चात् अवश्य ही बदल दी जाएगी)